दर्जनों परिवारों से तैयार होती है एक-एक ईंट ।

ईट भट्टों के बारे में जानने की जिज्ञासा ने मुझे बाराबंकी जिले के ओम श्री साईं ब्रिक फील्ड पर ले जा खड़ा किया
                                                                                   ओम श्री साईं ब्रिक फील्ड
जिन इलाकों में उद्योग लगते हैं वहां के आवागमन के लिए रोड बाजार का विकास होता है जहां बाजार 3 से 4 किलोमीटर दूरी पर होते हैं मजदूर अपनी रोज की जरूरतों के लिए 8 से 10 दिन पर जाकर खरीददारी कर पाता है यही है हर ईंट भट्टों की कहानी।
घर बनाने में ईट महत्वपूर्ण सामग्री होती है लेकिन ईट बनाने वाले लगभग 80% ईट भट्ठा मजदूरों के पास घर नहीं होता वह ईट भट्टों पर कच्चे ईट के मकान में या टीन के छत के नीचे रहते हैं जिनकी ऊंचाई 4 से 5 फिट होती है दर्जनों परिवार बच्चों के चारों कोनों पर ऐसे ही रहते हैं
                                                                                        कच्चे ईट के मकान
भट्टा मुंशी (मैनेजर) विनोद ने बताया मजदूरों का नाम इनके काम के हिसाब से होता है (पथाई ,भराई, झोकाई, निकासी, रबिश ,आदि ) नामों से जाना चाहता है। फिर उन्होंने मुझे कच्ची ईंट के बनाने से लेकर ईट को सुनहरे लाल रंग होने तक की प्रक्रिया को दिखाया।
                                                                                  मिट्टी के ढेले को फोड़ता सीताराम
पहले मिट्टी को खोदा जाता है फिर उसमें पानी डालकर आटे की तरह साना जाता है और घंटो तक रख दिया जाता है।
                                                                                           गीली मिट्टी से ईट तैयार करता पप्पू
फिर गीली मिट्टी को लकड़ी से बने हुए सांचे में डालकर तुरंत निकाल लिया जाता है जिससे या ईट के आकार के साथ साथ संस्था के नाम का भी आकार ले लेता है।
                                                                                     धूप में सूखती कच्ची ईंट
इन गीली मिट्टी या कच्ची ईंट को एक से 2 दिनों तक सुखाया जाता है ताकि इन्हें गोलाईयां (  चिमनी के चारों ओर से घिरी हुई ) तक पहुंचाया जा सके।
                                                                                    सड़कों पर गिरकर टूटी हुई कच्ची ईट
कच्ची ईंट ले जाते वक्त यह गिर कर टूट भी जाती हैं जो किसी काम में नहीं आती है।
                                                                             गोलाईयां मे जिगजैग तरीके से रखी कच्ची ईंट
इन कच्ची ईंट को गोलाईयां में रखा जाता है इस प्रक्रिया को भरईया कहते हैं इन ईट को जिगजैग तरीके से रखा जाता है ताकिया जल्दी पक जाएं और फिर ऊपर से रबिश से ढक दिया जाता हैं।
                                                                                      गोलाईयां में बनी हुई चाभी 
गोलाईयां के बीच बीच में बहुत सी चाभी बनी होती है जो धुएं को खींच कर चिमनी से बाहर निकलती है।
                                                                                          दर्जनों मोहरी
रबिश से ढकते वक्त इनमें दो दर्जन से अधिक गड्ढे किए जाते हैं जिन्हें मोहरी कहा जाता है जिनके जरिए कोयले को डाला जाता है।
                                                                                               कोयले और बुरादे को मिलाता अली
झारखंड से आए इन बड़े-बड़े कोयलों को हाथों से तोड़ा जाता है और इनमें लकड़ियों के बुरादे मिला जाते हैं।
                                                                                            कोयले को डालता गंगा राम
इन मोहरी में कोयला डालने वाले को झोकईया दल कहा जाता है जो कोयला झोंकते हैं यह लोग सुनिश्चित करते हैं कि भट्टे के अंदर का तापमान एकसा रहे हैं देखने में बहुत सरल लग रहा है या काम बहुत ही मुश्किल होता है यह लोग लकड़ी से बने हुए चप्पल पहनते हैं क्योंकि इस तापमान में आम चप्पल या जूते 3 से 4 मिनट में गलने लगते हैं।
                                                                                             रबिश से ढके हुए मोहरी
ईट पक जाने के बाद इन मोहरी को रबिश से ढक दिया जाता है और इन ईंट को ठंडे होने के लिए 20 से 25 दिनों तक छोड़ दिया जाता है।
                                                                                                       पक्की तैयार ईट
इन पर से रबिश हटाकर इन्हें निकाला जाता है और फिर या बड़ी बड़ी इमारतों और उनकी न्यू में लगने के लिए तैयार होते हैं।

सबकुछ घूमने के बाद कड़ी धूप में तपती एक छत के नीचे बैठकर चाय पी जा रही थी और थोड़ी बातचीत हो रही थी तभी विनोद ने बताया कि उनके पिताजी भी मुंशी थे कई भट्ठे पर मुंश गिरी कर चुके थे उन्हें ही देखकर मुंशी बनने की चाहत दिल में थी लेकिन मैं तो कक्षा तीन पढ़ा था ना तो पढ़ना आता था ना तो लिखना आता था फिर भी हिम्मत जुटाकर भट्ठे पर पहुंच गया काम मांगने कोयला तोड़ने के लिए कोई नहीं था तो उन्होंने मुझसे कोयला तोड़ने के लिए कहा मैंने कहा ठीक है कल से आऊंगा उस रात मै  सोचने लगा क्या करने गया था और क्या मिल गया सोचते सोचते कब सो गया पता ही नहीं पड़ा और अगले दिन सुबह होते ही कोयला तोड़ने पहुंच गया फिर समय निकालकर मुंशी के पास बैठकर उसके काम को देखने लगा जरूरत से ज्यादा कोयला तोड़कर ज्यादा से ज्यादा समय मुंशी के पास बिताने की कोशिश करता यह बात मुंशी को अच्छी नहीं लगी उसने मुझे काम से निकाल दिया फिर दूसरे भट्टे पर पहुंचा काम मांगा तो ट्रैक्टर की ड्राइवर सीट मिल गई कम से कम कोयला तोड़ने से तो ठीक ही था वहां पर भी खाली समय हमेशा मुंशी के पास बैठकर उसका काम देखा करता और 2 से 3 साल बाद बहुत कुछ समझ में आने लगा था क्योंकि अकेले जाने में पर्ची पर लिखा-पढ़ी करनी होती है जिस से बहुत कुछ सीख गया था और फिर वहां काम छोड़ कर इस भट्ठे पर आ गया और मुंशी गिरी शुरु कर दी मैं अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम पढ़ा रहा हूं ताकि उनका भविष्य यहां के रबिश में दब कर ना रह जाए मैं चाहता हूं कि मेरा बेटा सरकारी नौकरी करें और अगर भट्टे पर काम करना चाहता है तो कम से कम उसे मेरी तरह इतने पापड़ ना बेलने पड़े उसे लेखा-जोखा का काम तुरंत मिल जाए।

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